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पाण्डुलिपियों को संरक्षित करेगा साँची विश्वविद्यालय

पाण्डुलिपियों को संरक्षित करेगा साँची विश्वविद्यालय
  • ज्ञान भारतम मिशन के प्रो. अनीर्बान दास का विशेष व्याख्यान
  • भारत और विदेश में उपलब्ध पाण्डुलिपियां होंगी संरक्षित
  • भारतीय ए.आई के माध्यम से हो रहा है संरक्षण

साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय ज्ञान भारतम मिशन के तहत बौद्ध और बौद्धोत्तर काल की उन समस्त पाण्डुलिपियों के संरक्षण में भारत सरकार का सहयोग करेगा जो भारत और भारत के बाहर उपलब्ध हैं।
साँची विश्वविद्यालय में आज भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय के तहत चलाए जा रहे ज्ञान भारतम मिशन के प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रो. अनीर्बान दास का विशेष व्याख्यान हुआ। उन्होंने शिक्षकों, छात्रों और शोधार्थियों से आह्वान किया कि वो अपने जीवन में कम से  कम एक-एक पाण्डुलिपि के संरक्षण यानी डिजिटाइज़ेशन का कार्य करें ताकि इन पाण्डुलिपियों को विश्वधरोहर बनाकर पूरे विश्व के सामने पूर्ण पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया जा सके।
प्रो. अनीर्बान दास ने बताया कि ज्ञान भारतम, भारतीय ए.आई का उपयोग करता है और इसका डेटा सिर्फ भारत में ही रहता है और किसी विदेशी सर्वर पर उपलब्ध नहीं होता है। उनके अनुसार पूरे देश में ज्ञान भारतम के 50 केंद्र बनाए गए हैं जहां पर ऐसे सभी लोग पाण्डुलिपियां प्रमाण के साथ ऑनलाइन अपलोड करते हैं। जिनकी जांच के बाद ज्ञान भारतम उन्हें ऑनलाइन उपलब्ध कराता है।
प्रो. दास के अनुसार लगभग सवा पांच करोड़ पाण्डुलिपियां पूरे देश से ज्ञान भारतम पर अपलोड की गई हैं। जांच के बाद इनमें से लगभग 2 करोड़ 49 लाख पाण्डुलिपियों को पूर्ण प्रमाण न मिलने के कारण हटा दिया गया है। उनके अनुसार लगभग सवा करोड़ पाण्डुलिपियां पोर्टल पर रजिस्टर की गई हैं। जबकि, लगभग 95 हज़ार पाण्डुलिपियां अभी भी दर्ज की जानी बाकी हैं।
प्रो. अनीर्बान दास ने भारत से बाहर जा चुकी पाण्डुलिपियां क्योंकि हम भारतीयों ने इनकी कद्र नहीं की और अब वे विदेशी म्यूज़ियमों में हैं। उन्होंने उदाहरण दिया, जैसे ‘कृषि पाराशर का पेंटेरा’ जो कि जर्मनी में है। इसी तरह ब्रिटेन के म्यूज़िम में तुर्की के माध्यम से उपलब्ध ‘मित्तानी स्क्रिप्ट’, ‘आर्यभट्ट के शून्य का सिद्धांत’ की बक्सली पाण्डुलिपि विदेशों में उपलब्ध है।
उन्होंने कहा कि श्रीलंका, लाओस, थाइलैंड, कंबोडिया और अन्य बौद्ध देशों में बहुत सी बौद्ध पाण्डुलिपियां पड़ी हुई हैं जिनके संरक्षण की ज़रूरत है। उन्होंने बताया कि हमारी पाण्डुलिपियों में जियोटैगिंग से अधिक सुदृढ़ व्यवस्था उपलब्ध थी लेकिन हमने इस पर कार्य नहीं किया।
प्रो. दास ने कहा कि जो पाण्डुलिपियां हमारे पास उपलब्ध हैं उन पर हम ध्यान नहीं दे रहे हैं। उनके अनुसार भारत में अश्व चिकित्सा और उनके संरक्षण पर पाण्डुलिपि, गज चिकित्सा पर पाण्डुलिपि, चोरी पर पाण्डुलिपि इत्यादि उपलब्ध हैं। इन्हें ‘ज्ञान भारतम’ और भारतीय जी.पी.टी और ‘ज्ञान मित्रम’ के माध्यम से तुरंत ही(यानी रियल टाइम ट्रांजेक्शन) प्राप्त किया जा सकता है।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बिमलेंद्र कुमार ने कहा कि ज्ञान भारतम देश की संस्कृति के संरक्षण करने वाला बैंक है। प्रो. कुमार ने कहा कि पाली भाषा में सबसे पुरानी मेनू स्क्रिप्ट नौंवी सदी ईसवी की है। जो कि नेपाल के रॉयल दरबार म्यूज़ियम, काठमांडु में उपलब्ध है। प्रो. बिमलेंद्र कुमार ने बताया कि सिंहली भाषा में अभिधम्म की पाण्डुलिपि थाइलैंड के ओटान विश्वविद्यालय में उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि तिब्बती, पाली, संस्कृति, और मिश्रित संस्कृत पर साँची विश्वविद्यालय कार्य करने की योजना बना रहा है। कार्यक्रम का आभार डीन प्रो. नवीन मेहता ने किया।